| ISBN | 9789350483015 |
|---|---|
| Lekhak | |
| Prakashak |
विवेकानंद के सपनों का भारत
150.00
गुरुभाइयों में सम्मानपूर्वक ‘स्वामीजी’ संबोधन प्राप्त करनेवाले नरेंद्रनाथ दत्त ने ऊहापोह की स्थिति में मठ छोड़कर भारत-भ्रमण करने का मन बनाया। अपने गुरुभाइयों को भी स्पष्ट निर्देश दिया कि अपना झोला उठाकर भारत का मानचित्र अपने साथ लो और भारत-भ्रमण के लिए निकल पड़ो। भारत को जानना एवं भारतवासियों को भारत की पहचान करा देना, यही हमारा प्रथम कार्य है। स्वामीजी ने धीर-गंभीर होकर कहा कि योगी बनना चाहते हो तो पहले उपयोगी बनो, भारतमाता के दुःख व कष्ट को समझो। उसे दूर करने के लिए अपने आपको उपयोगी बनाओ, तभी तो योगी बन पाओगे।
आज की वर्तमान पीढ़ी भी वर्ष 2020 तक विश्व को नेतृत्व प्रदान करनेवाले भारत को अपने हाथों सँवारना चाहती है। भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन, गोरक्षा, गंगा की पवित्रता, कालेधन की वापसी, राममंदिर-रामसेतु आदि मानबिंदुओं के सम्मान की रक्षा के आंदोलन, आसन्न जल संकट, पर्यावरण, कानून, सीमा-सुरक्षा, सांप्रदायिक सौहार्द, संस्कार-युक्त शिक्षा, संस्कृति रक्षा, राष्ट्रवादी साहित्य, महिला गौरवीकरण आदि के लिए हो रही गतिविधियाँ भारत निर्माण की छटपटाहट का ही प्रकटीकरण हैं। इन सभी क्रियाकलापों को नेतृत्व प्रदान करनेवाले लोग कम या अधिक मात्रा में स्वामी विवेकानंद से प्रेरणा पाकर उनके सपनों का भारत बनाने में लगे हैं।
स्वामी विवेकानन्द के सपनों के स्वावलंबी, स्वाभिमानी, शक्तिशाली, सांस्कृतिक, संगठित भारत के निर्माण को कृत संकल्प कृति।
शिक्षा : एम.ए. (अर्थशास्त्र), पी-एच.डी. (कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय)।
कॉलेज अध्यापन में 38 वर्ष का अनुभव। दिल्ली विश्वविद्यालय के एस.एस.एन. कॉलेज में अर्थशास्त्र के रीडर पद से सेवानिवृत्त।
प्रकाशन : ‘वैल्यू ऐंड डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम इन एनशिएंट इंडिया’, ‘भारत का आर्थिक इतिहास’, ‘हिंदू अर्थचिंतन’, विकास का नया प्रतिमान सुमंगलम् के अलावा अर्थशास्त्र तथा अन्य विषयों की कॉलेज पाठ्यक्रम की लगभग 20 पुस्तकें प्रकाशित विभिन्न पत्र तथा पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित।
महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी, अजमेर के बोर्ड ऑफ स्टडीज के सदस्य, पी.आर.आई. चंडीगढ़ के पूर्व-निदेशक, आई.सी.एस.एस.आर. (ICSSR), सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन काउंसिल तथा केंद्रीय हिंदी समिति के पूर्व सदस्य।
संप्रति : अनेक सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं में महत्त्वपूर्ण दायित्व।

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